व्रत की विधि:
श्रावण वद सप्तमी के दिन सौभाग्यवती स्त्रियाँ यह व्रत करती हैं। व्रती को प्रातःकाल ठंडे पानी से स्नान करके पूरे दिन ठंडा भोजन करना चाहिए। इस दिन चूल्हा नहीं जलाना चाहिए। धीमी लौ पर दीपक जलाकर शीतला माता की कथा करनी चाहिए। इस व्रत को करने से धन-धान्य, संतान और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
व्रत कथा:
एक गाँव में देवरानी और जेठानी अपनी सास के साथ रहती थीं। दोनों के एक-एक पुत्र थे। जेठानी ईर्ष्यालु थी जबकि देवरानी सरल स्वभाव और प्रेमपूर्ण थी।
एक बार श्रावण मास में रांधण छठ का दिन आया। सास ने देवरानी को रसोई बनाने को कहा। वह आधी रात तक रसोई में व्यस्त रही। तभी झूले में सोया बच्चा रोने लगा। देवरानी थकी हुई थी, उसने रसोई छोड़ दी और बच्चे को गोद में लेकर बगल में लेट गई और सो गई। चूल्हा जलता ही रह गया।
आधी रात को शीतला माता भ्रमण पर निकलीं। वे देवरानी के घर पहुँचीं और चूल्हे की आग में हाथ डालने लगीं, पर वहाँ उन्हें ठंडक के बजाय तपन महसूस हुई। उनका शरीर जलने लगा। उन्होंने क्रोधित होकर शाप दिया: “जैसे मेरा शरीर जला, वैसे तेरा पेट जले।”
सुबह जब देवरानी उठी तो देखा कि चूल्हा अब भी जल रहा था और उसका बच्चा जलकर मृत पड़ा था। वह रोने लगी और समझ गई कि यह माता शीतला का शाप है। वह सास के पास गई और सब बताया। सास ने कहा, “माता शीतला से क्षमा माँग, सब ठीक हो जाएगा।”
देवरानी बच्चे को टोकरी में रखकर चल पड़ी। रास्ते में उसे दो सरोवर मिले। दोनों पानी से लबालब थे लेकिन कोई उनका पानी नहीं पीता था, क्योंकि जिसने भी पिया वह मर गया।
सरोवरों ने देवरानी से पूछा, “बहन! कहाँ जा रही हो?”
देवरानी ने उत्तर दिया, “मैं शीतला माता के पास उनके शाप का निवारण माँगने जा रही हूँ।”
सरोवरों ने कहा, “बहन! हमारे पापों के बारे में भी माता से पूछ लेना। हमारा पानी कोई पीता नहीं – जैसे ही कोई पीता है, उसकी मृत्यु हो जाती है।”
देवरानी आगे बढ़ी। उसे रास्ते में दो बैल मिले जिनके गलों में घंटियाँ बँधी थीं। वे आपस में लड़ते रहते थे। उन्होंने पूछा, “बहन! कहाँ जा रही हो?”
देवरानी ने कहा, “मैं अपने शाप का निवारण माँगने जा रही हूँ।”
बैल बोले, “हमारा भी हाल पूछ लेना – हम क्यों हर समय लड़ते रहते हैं?”
थोड़ा आगे चलने पर एक बोरड़ी के पेड़ के नीचे एक बूढ़ी महिला अपने सिर में खुजली कर रही थी। उन्होंने देवरानी से कहा, “बहन! मेरे सिर में बहुत खुजली हो रही है, ज़रा देख दो।”
देवरानी थकी हुई थी लेकिन उसने अपने मृत बच्चे को उनके गोद में रखा और बाल झाड़ने लगी। थोड़ी देर में बुज़ुर्ग महिला को राहत मिली। उन्होंने आशीर्वाद दिया: “जैसे मेरा सिर ठंडा हुआ, वैसे ही तेरा पेट ठंडा हो।” यह कहते ही चमत्कार हुआ – मृत बच्चा जीवित हो उठा। देवरानी समझ गई कि ये शीतला माता ही हैं। वह उनके चरणों में गिर पड़ी।
देवरानी ने उनसे सरोवरों के शाप के बारे में पूछा। शीतला माता ने बताया: “पिछले जन्म में वे दोनों सौतनें थीं। वे हमेशा झगड़ती थीं और किसी को शुद्ध भोजन नहीं देती थीं। इसलिए इस जन्म में उनका पानी अशुद्ध हो गया है। तू उनका पानी पी ले, उनका पाप दूर होगा।”
फिर उसने बैलों के शाप के बारे में पूछा। माता ने बताया: “वे दोनों पहले जन्म में देवरानी और जेठानी थीं – ईर्ष्यालु और स्वार्थी। अब बैल बनकर लड़ते रहते हैं। तू उनके गले से घंटियों की रस्सियाँ खोल दे – उनका पाप नष्ट होगा।”
देवरानी माता के आशीर्वाद लेकर खुशी-खुशी वापस लौटी। रास्ते में बैलों के गले से घंटियाँ खोल दी, वे शांत हो गए। फिर सरोवर का पानी पीया, तब से वह जल अमृत जैसा हो गया। घर पहुँचकर सास को सब बताया। यह सब देखकर जेठानी को जलन हुई।
अगले साल रांधण छठ फिर आई। जेठानी ने सोचा कि मैं भी ऐसा करूँगी ताकि माता मुझे भी दर्शन दें। उसने भी चूल्हा जलता छोड़ दिया और सो गई। आधी रात को माता आईं और जलती आग से जल गईं। क्रोधित होकर उन्होंने भी शाप दिया – “जैसे मेरा शरीर जला, वैसे तेरा पेट जले।”
सुबह जेठानी का बच्चा मरा हुआ था। लेकिन वह दुखी होने के बजाय प्रसन्न हुई – सोची कि अब मुझे भी माता मिलेंगी।
वह भी बच्चे को लेकर निकली। रास्ते में वही सरोवर मिले, उन्होंने आग्रह किया – “बहन! हमारे पाप पूछती आना।” लेकिन जेठानी ने गुस्से में कहा – “तुमसे क्या मतलब? मेरा बच्चा मरा है, मैं शीतला माता के पास जा रही हूँ।” फिर वही बैल मिले, फिर वही बूढ़ी माता भी मिलीं, जिन्होंने कहा: “बहन, ज़रा सिर देख दे।” लेकिन जेठानी ने रूखेपन से जवाब दिया: “क्या मैं फुर्सत में हूँ? देख नहीं रही मेरा बच्चा मरा है?” वह दिनभर घूमती रही लेकिन माता कहीं नहीं मिलीं। आखिरकार थकी हुई और निराश होकर वह घर लौट आई।
“हे शीतला माता! जैसे आपने देवरानी को कृपा की, वैसे ही सब पर करें।”





