माघ महीने के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम "जया" है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली उत्तम तिथि है। यह पवित्र होने के साथ-साथ पापों का नाश करने वाली भी है, और मनुष्य को भोग तथा मोक्ष प्रदान करती है। इतना ही नहीं, यह ब्रह्महत्या जैसे पाप और पिशाचत्व का भी नाश करती है। इस व्रत को करने से मनुष्य को कभी प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता। इसलिए, हे राजन! प्रयत्नपूर्वक "जया" नाम की एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।
एक समय की बात है। स्वर्गलोक में देवराज इन्द्र राज्य कर रहे थे। देवगण पारिजात वृक्षों से युक्त नंदनवन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। लगभग पचास गंधर्वों के नायक देवराज इन्द्र स्वेच्छा अनुसार वन में विहार करते हुए बहुत आनंद के साथ नृत्य का आयोजन कर रहे थे। उसमें गंधर्व गान कर रहे थे, जिनमें पुष्पदंत, चित्रसेन और उसका पुत्र प्रमुख थे। चित्रसेन की पत्नी का नाम मालिनी था। मालिनी से एक सुंदर कन्या उत्पन्न हुई थी, जो "पुष्पवती" के नाम से प्रसिद्ध थी। पुष्पदंत एक गंधर्व का पुत्र था, जिसे लोग "माल्यवान" कहते थे। माल्यवान और पुष्पवती की उम्र समान थी। ये दोनों भी इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए नृत्य हेतु उपस्थित थे।
इन दोनों का गान चल रहा था, और उनके साथ अप्सराएँ भी थीं। परस्पर प्रेम होने के कारण दोनों मोह में फँस गए। चित्त चंचल हो गया। इसलिए वे शुद्ध गायन नहीं कर सके। कभी ताल का भंग होता, तो कभी गीत रुक जाता। इन्द्र ने उनके इस प्रमाद पर विचार किया और इसे अपना अपमान मानकर क्रोधित हो गए। अतः दोनों को श्राप देते हुए इन्द्र बोले:
"अरे मूर्खों! तुम दोनों को धिक्कार है। तुम पतित हो और मेरे आदेश का उल्लंघन करने वाले हो। इसलिए तुम पति-पत्नी रूप में पिशाच बन जाओ।"
इस प्रकार इन्द्र के श्राप से दोनों के मन में अत्यंत दुःख उत्पन्न हुआ। वे दोनों हिमालय पर्वत पर चले गए और पिशाच योनि प्राप्त कर भयंकर दुःख भोगने लगे। शारीरिक यंत्रणाओं से उत्पन्न पीड़ा से पीड़ित होकर वे दोनों पर्वत की गुफाओं में भटकते रहते थे। एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाचिनी से कहा…
इस प्रकार चिंतित होकर वे दोनों दुःख के कारण सूखते जा रहे थे। देवयोग से उनके जीवन में माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि प्राप्त हो गई। "जया" नाम की यह प्रख्यात तिथि सभी तिथियों में श्रेष्ठ है। उस दिन उन्होंने सभी प्रकार का आहार त्याग दिया। जलपान भी नहीं किया। किसी भी जीव की हिंसा नहीं की। यहाँ तक कि फल भी नहीं काटा। निरंतर दुःख से युक्त होकर वे एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए। सूर्यास्त हो गया। उनकी प्राणहरिणी भयंकर रात्रि उपस्थित हो गई। उन्हें नींद भी नहीं आई। वे रति अथवा किसी अन्य सुख का अनुभव नहीं कर सके।
सूर्योदय हुआ। द्वादशी का दिन आया। इस प्रकार उन पिशाच दंपति द्वारा "जया" एकादशी का उत्तम व्रत हो गया। उन्होंने रात्रि में जागरण भी किया था। इस व्रत के प्रभाव से और भगवान विष्णु की कृपा से उनका पिशाचत्व दूर हो गया। पुष्पवती और माल्यवान अपने पूर्व रूप में लौट आए। उनके हृदय में वही पुराना प्रेम उमड़ पड़ा। उनके शरीरों पर पहले जैसे आभूषण शोभायमान हो गए। वे दोनों मनोहर रूप धारण करके विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक को गए और वहाँ देवराज इन्द्र के समक्ष पहुँचकर प्रसन्नता सहित उन्हें प्रणाम किया।
उन्हें उस रूप में देखकर इन्द्र को अत्यंत आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा:
"बताओ! किस पुण्य के प्रभाव से तुम दोनों पिशाच योनि से मुक्त हो गए? तुम तो मेरे द्वारा शापित थे, फिर कौन-से देवता ने तुम्हें इससे छुटकारा दिलाया?"
माल्यवान बोले:
"स्वामी! भगवान वासुदेव की कृपा और 'जया' नाम की एकादशी के व्रत से हमारा पिशाचत्व दूर हो गया है।"
श्रीकृष्ण कहते हैं:
"हे राजन! इसलिए एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। जिसने यह एकादशी व्रत कर लिया, उसने सभी प्रकार के दान कर दिए और सभी यज्ञ पूरे कर लिए। इस महात्म्य को पढ़ने और सुनने से अग्निहोत्र यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है।"





