पर्व का परिचय:
जल झिलनी एकादशी, जिसे पार्श्ववर्ती एकादशी भी कहा जाता है, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह व्रत भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए अत्यंत पावन माना जाता है। इस दिन भगवान को जल में झुलाने या नौका विहार कराने की परंपरा होती है, जिसे "जल झिलनी" कहा जाता है। यह एकादशी चातुर्मास के दौरान आती है, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं।
कथा और पौराणिक मान्यताएँ:
श्रीकृष्ण का नौका विहार:
मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ यमुना में नौका विहार किया था। उसकी स्मृति में आज भी मंदिरों में भगवान को नौका में बिठाकर झील या कुंड में जलविहार कराया जाता है।
पार्श्ववर्ती एकादशी का महत्व:
इस दिन भगवान विष्णु अपने शयन की मुद्रा बदलते हैं — इसलिए इसे पार्श्ववर्ती एकादशी भी कहा जाता है।
शास्त्रीय विधियाँ:
पंचरात्र ग्रंथ के अनुसार, भगवान विष्णु का 1001 कलशों से अभिषेक, फूलों और वस्त्रों से श्रृंगार करके उन्हें नौका में बिठाना चाहिए।
दही दान की महिमा:
नौका विहार के दौरान श्रीकृष्ण ने गोपियों से दही मांगा था — इसलिए इस दिन दही का दान विशेष पुण्यदायक माना जाता है।
यह पर्व क्यों मनाया जाता है?
यह व्रत भगवान की कृपा पाने, पापों से मुक्ति, अंत में मोक्ष प्राप्त करने और आध्यात्मिक उन्नति हेतु मनाया जाता है। यह माना जाता है कि इस उत्सव के दर्शन से ही अंत समय में मोक्ष मिलता है।
प्रमुख परंपराएँ:
उपवास:
भक्त उपवास करते हैं — विशेष रूप से निराहार या फलाहार के साथ।
जल झिलनी समारोह:
भगवान को नौका में रखकर जलाशयों में भ्रमण कराया जाता है। भजन-कीर्तन और जयघोषों के साथ भक्त दर्शनों का लाभ लेते हैं।
जागरण और स्मरण:
रात्रि में भजन, ध्यान और भगवान के नाम-स्मरण का विशेष महत्व है।
दान और पूजा:
दही, अन्न, वस्त्र आदि का दान किया जाता है और विष्णु सहस्त्रनाम से भगवान की स्तुति की जाती है।
पर्व का महत्व:
महापापों से मुक्ति:
झूठ, हत्या, चोरी जैसे पापों से भी इस व्रत के प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
मोक्ष की प्राप्ति:
इस उत्सव की स्मृति अंत समय में आने पर जीव को भगवान का सान्निध्य और अक्षय सुख प्राप्त होता है
ईश्वर के साथ संबंध:
यह व्रत भक्त और भगवान के बीच प्रेम, भक्ति और समर्पण को सशक्त करता है।
निष्कर्ष:
जल झिलनी एकादशी केवल व्रत नहीं, बल्कि ईश्वर के साथ एक आत्मिक नौका यात्रा है। इस दिन का श्रद्धा और समर्पण से पालन करने से आत्मा को शुद्धि, पवित्रता और भगवत्कृपा की प्राप्ति होती है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जब हम भगवान और संतों के चरणों से जुड़े रहते हैं, तब जीवन की नैया सहज ही पार हो जाती है।








