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केतु राशि गोचर (Ketu Gochar) – वैदिक ज्योतिष में केतु का राशि परिवर्तन

वैदिक ज्योतिष में केतु राशि गोचर का अर्थ है केतु का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश। केतु सामान्यतः लगभग १८ महीनों में राशि बदलता है और राहु की तरह हमेशा वक्री गति में चलता है।

केतु आध्यात्मिकता, वैराग्य, पूर्व जन्म कर्म, अंतर्ज्ञान, अचानक अलगाव, रहस्यमय अनुभव और मोक्ष का कारक है। जब केतु नई राशि में प्रवेश करता है, तो वह जन्म कुंडली के अनुसार आंतरिक परिवर्तन लाता है।

केतु राशि गोचर का महत्व

केतु एक छाया ग्रह है जो मोक्ष और आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा है। इसका गोचर कर्मिक शुद्धि, भौतिक इच्छाओं से दूरी और आंतरिक जागरण दर्शाता है। विशेष रूप से ध्यान और साधना के लिए महत्वपूर्ण है।

केतु गोचर के दौरान क्या होता है?

केतु के राशि परिवर्तन से वैराग्य और आत्मचिंतन बढ़ता है। इसका प्रभाव लग्न और चंद्र राशि से जिस भाव में गोचर होता है उस पर निर्भर करता है।

केतु गोचर आध्यात्मिक विकास, अचानक समाप्ति, स्वास्थ्य संवेदनशीलता, शोध कार्य और गुप्त विषयों को प्रभावित करता है।

केतु गोचर प्रत्येक भाव में कैसे प्रभाव डालता है?

प्रथम भाव में केतु आत्मचिंतन बढ़ाता है। चतुर्थ भाव में घरेलू सुख से दूरी ला सकता है। सप्तम भाव में संबंधों में दूरी ला सकता है। दशम भाव में करियर दिशा परिवर्तन कर सकता है।

क्या केतु गोचर हमेशा नकारात्मक होता है?

हमेशा नहीं। केतु अलगाव दे सकता है, लेकिन आध्यात्मिक शक्ति भी बढ़ाता है। इसका प्रभाव संपूर्ण जन्म कुंडली पर निर्भर करता है।

केतु गोचर की गणना कैसे की जाती है?

केतु का गोचर उसकी वक्री खगोलीय गति के आधार पर निर्धारित होता है। वह सामान्यतः लगभग १८ महीने एक राशि में रहता है और फिर अगली राशि में प्रवेश करता है।

केतु एक राशि में कितने समय तक रहता है?

केतु प्रत्येक राशि में लगभग १८ महीने तक रहता है।

क्या केतु गोचर सभी को समान रूप से प्रभावित करता है?

नहीं, इसका प्रभाव व्यक्ति की जन्म कुंडली, लग्न और ग्रह योग पर निर्भर करता है।

क्या केतु गोचर आध्यात्मिकता के लिए महत्वपूर्ण है?

हाँ, क्योंकि केतु वैराग्य और मोक्ष का कारक है, इसका गोचर आध्यात्मिक जागरण और कर्मिक मुक्ति को प्रभावित करता है।