

वैदिक ज्योतिष में गुरु वक्री का अर्थ है पृथ्वी से देखने पर गुरु का पीछे की ओर चलता हुआ दिखाई देना। यह दृश्य भ्रम है, लेकिन इसका प्रभाव आंतरिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।
गुरु ज्ञान, धन, विवाह, संतान और आध्यात्मिकता का कारक है। गुरु वक्री होने पर विस्तार और वृद्धि आंतरिक रूप ले सकती है।
वक्री गुरु विवाह, आर्थिक वृद्धि और शिक्षा को प्रभावित कर सकता है। यह आंतरिक ज्ञान बढ़ाता है, लेकिन बाहरी सफलता में देरी हो सकती है।
गुरु प्रति वर्ष लगभग एक बार वक्री होता है और लगभग ४ महीनों तक वक्री रहता है।
नहीं। वक्री गुरु आंतरिक रूप से शक्तिशाली होता है और आध्यात्मिक गहराई प्रदान करता है।
विवाह में देरी, धन वृद्धि में मंदी और शिक्षा में गहन अध्ययन की प्रवृत्ति हो सकती है।
देरी संभव है, लेकिन अंतिम परिणाम पूरी कुंडली पर निर्भर करता है।
हाँ, आर्थिक वृद्धि धीमी हो सकती है।
गुरु मंत्र, पीली वस्तुओं का दान और उपयुक्त होने पर पुखराज धारण करना लाभकारी है।
यह आंतरिक रूप से शक्तिशाली माना जाता है, लेकिन परिणाम में देरी हो सकती है।