




वैदिक ज्योतिष में शनि को अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रह माना गया है और इन्हें कर्मफलदाता कहा जाता है। शनि व्यक्ति के शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार जीवन में फल प्रदान करते हैं। सामान्यतः शनि को नकारात्मक रूप में देखा जाता है, जबकि शास्त्रों में शनि को पापों का शमन करने वाला ग्रह बताया गया है।
शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं और अपनी स्थिति से तीन राशियों को प्रभावित करते हैं। इसी सात वर्ष छह महीने की अवधि को शनि साढ़े साती कहा जाता है। यह समय जीवन में अनुशासन, धैर्य और कर्म की परीक्षा का होता है।
साढ़े साती के तीन चरण होते हैं। प्रथम चरण में शनि द्वादश भाव में गोचर करते हैं, जिससे खर्च, तनाव और मानसिक दबाव बढ़ सकता है। द्वितीय चरण में शनि जन्म राशि पर गोचर करते हैं, जो भावनात्मक असंतुलन, दांपत्य और कार्यक्षेत्र में चुनौतियाँ ला सकता है। अंतिम चरण में शनि द्वितीय भाव में रहते हैं, जहाँ परिवार, स्वास्थ्य और धन से जुड़े विषय सामने आते हैं।
साढ़े साती के दौरान शनि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। यह समय कठिन अवश्य हो सकता है, लेकिन साथ ही दीर्घकालिक सफलता, परिपक्वता और स्थिरता भी प्रदान करता है। इसका वास्तविक प्रभाव जन्म कुंडली में शनि की स्थिति पर निर्भर करता है।
शनि साढ़े साती वह अवधि है जब शनि चंद्र राशि से द्वादश, प्रथम और द्वितीय भाव में गोचर करते हैं।
नहीं, साढ़े साती अनुशासन, आत्मविकास और दीर्घकालिक सफलता भी प्रदान कर सकती है।
यह विलंब, जिम्मेदारियाँ और कठिनाइयाँ ला सकती है, लेकिन धैर्य और स्थिरता भी बढ़ाती है।
जन्म कुंडली में शनि की स्थिति और बल के आधार पर इसका वास्तविक प्रभाव जाना जा सकता है।
हाँ, कई लोगों को साढ़े साती के दौरान या बाद में बड़ी सफलता प्राप्त होती है।