बही-खाता पूजन (शारदा पूजन) २०२६: तारीख एक नज़र में
बही-खाता पूजन, जिसे गुजरात में चोपड़ा पूजन और कई जगह शारदा पूजन भी कहते हैं, दिवाली के दिन किया जाता है। २०२६ में यह रविवार, ८ नवंबर २०२६ को कार्तिक अमावस्या पर है। इस दिन व्यापारी और घर के लोग नई बही या खाता-बही की पूजा माँ सरस्वती (शारदा), माँ लक्ष्मी, गणेश जी और कुबेर के साथ करते हैं और नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत करते हैं। शाम के लक्ष्मी पूजा मुहूर्त के लिए हमारा दिवाली पेज देखें।
बही-खाता पूजन या शारदा पूजन क्या है?
पुरानी परंपरा में हिसाब-किताब लिखने की बही को ही खाता या चोपड़ा कहा जाता है। “शारदा” माँ सरस्वती का ही एक नाम है, जो विद्या, वाणी और कला की देवी मानी जाती हैं। बही-खाता पूजन में नई बही को पहली एंट्री से पहले पूजा जाता है, ताकि साल का लेखा-जोखा श्रद्धा और ईमानदारी के साथ शुरू हो।
कई परिवार इसमें दो बातें एक साथ देखते हैं। एक तरफ़ बही, तिजोरी और काम के औज़ारों का पूजन, और दूसरी तरफ़ सरस्वती पूजन, जिसमें किताब, कलम और वाद्य रखे जाते हैं। गुजरात में दोनों साथ होते हैं, इसीलिए वहाँ चोपड़ा पूजन को शारदा पूजन भी कह दिया जाता है।
दिवाली पर बही-खाता पूजन कब करें?
आम तौर पर दो तरीके चलते हैं। ज़्यादातर व्यापारी शाम को सूर्यास्त के बाद लक्ष्मी पूजा के मुहूर्त में ही गणेश, लक्ष्मी और बही का पूजन एक साथ कर लेते हैं। कुछ लोग दिन के किसी शुभ चौघड़िया, जैसे लाभ, अमृत या शुभ, में बही-खाता पूजन कर लेते हैं और लक्ष्मी पूजा शाम को अलग से करते हैं।
सही समय आपके शहर के सूर्योदय और सूर्यास्त पर निर्भर करता है, इसलिए किसी दूसरे शहर का समय देखकर पूजा न करें। अपने शहर का दिन भर का चौघड़िया हमारे चौघड़िया पेज पर मिल जाएगा। अगर आपके परिवार या पंडित जी की कोई अलग परंपरा है, तो उसी का पालन करें।
पूजन सामग्री की सूची
- नई बही या खाता-बही और कलम (या पेन)
- चौकी और उस पर बिछाने के लिए लाल या पीला कपड़ा
- गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्ति या फोटो, और जिन घरों में कुबेर पूजन होता है उनके लिए कुबेर की तस्वीर
- रोली, हल्दी, अक्षत (चावल) और चंदन
- ताज़े फूल, माला और गणेश जी के लिए दूर्वा
- घी का दीपक, धूप-अगरबत्ती और कपूर
- मिठाई, फल, नारियल, पान और सुपारी
- सिक्के, नोट और गल्ला या तिजोरी
- जल से भरा कलश, उस पर आम के पत्ते और नारियल
बही-खाता पूजन की विधि
हर परिवार और समाज की अपनी रीति होती है। नीचे सामान्य क्रम दिया गया है, इसे कोई पक्का नियम न मानें।
- दुकान या घर की सफ़ाई करें, द्वार पर तोरण लगाएँ और रंगोली बनाएँ। स्नान करके साफ़, हो सके तो नए, कपड़े पहनें।
- चौकी पर कपड़ा बिछाकर गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्ति या फोटो रखें और पास में कलश स्थापित करें।
- नई बही को देवताओं के सामने रखें और उसके कवर पर रोली-हल्दी लगाएँ।
- घी का दीपक और धूप जलाएँ, फिर हाथ में जल-अक्षत लेकर संकल्प करें कि आप नए खाते की शुरुआत कर रहे हैं।
- सबसे पहले गणेश जी का पूजन करें, फूल, दूर्वा और मिठाई चढ़ाएँ, क्योंकि हर शुभ काम उन्हीं से शुरू होता है।
- फिर लक्ष्मी जी और सरस्वती माँ को रोली, चावल और फूल अर्पित करें। कई परिवार इस समय लक्ष्मी या सरस्वती का मंत्र या स्तोत्र पढ़ते हैं।
- कुबेर का स्मरण करें और तिजोरी, सिक्के व कलम पर रोली-अक्षत लगाएँ।
- नई बही में पहली एंट्री लिखें (अगले भाग में देखें)।
- आरती करें, प्रसाद चढ़ाएँ और परिवार, कर्मचारियों व पड़ोसियों में मिठाई बाँटें।
नई बही में क्या लिखें?
पहले पृष्ठ पर कलम को रोली या लाल स्याही में डुबोकर आमतौर पर स्वस्तिक बनाया जाता है। उसके नीचे कई लोग श्री गणेशाय नमः लिखते हैं, फिर शुभ-लाभ (सही रास्ते से शुभ और लाभ) और ऋद्धि-सिद्धि, जो गणेश जी की दो शक्तियाँ मानी जाती हैं और समृद्धि व पूर्णता का प्रतीक हैं। कुछ लोग लक्ष्मी या सरस्वती का नाम और विक्रम संवत का वर्ष भी लिखते हैं।
कई परिवार इसके बाद पहली छोटी-सी एंट्री भी डालते हैं, अक्सर प्रतीक के तौर पर कोई छोटी रकम। यह शुभारंभ की रीति है, आय या मुनाफ़े का कोई वादा नहीं। असली हिसाब सामान्य तरीके से ही आगे चलता है।
सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश और कुबेर एक साथ क्यों?
इस पूजा में हर देवता की अपनी भूमिका है, जिसे व्यापारी अच्छी तरह समझते हैं। लक्ष्मी जी की पूजा समृद्धि के लिए होती है। सरस्वती (शारदा) ज्ञान और सही निर्णय का प्रतीक हैं, क्योंकि बिना समझ के धन टिकता नहीं, ऐसी मान्यता है। गणेश जी विघ्न हरते हैं और हर नए काम से पहले पूजे जाते हैं। कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष माने जाते हैं और धन की सँभाल के लिए याद किए जाते हैं।
शारदा पूजन का असली संदेश यही है कि धन और विद्या दोनों साथ पूजे जाएँ। इसी वजह से इस दिन विद्यार्थी भी सरस्वती पूजन करते हैं और पूजा में बही के साथ किताबें रखी जाती हैं।
गुजरात की परंपरा: बेस्टु वरस और लाभ पंचम तक
गुजरात में चोपड़ा पूजन नए साल से गहराई से जुड़ा है। दिवाली की रात विक्रम संवत का पुराना साल पूरा होता है और अगले दिन बेस्टु वरस, यानी गुजराती नववर्ष, मनाया जाता है। लोग मंदिर जाते हैं और रिश्तेदारों व पड़ोसियों को शुभकामनाएँ देते हैं। विस्तार से जानने के लिए हमारा नववर्ष पेज देखें।
कुछ दिन बाद कार्तिक शुक्ल पंचमी को आती है लाभ पंचम, जिसे सौभाग्य पंचमी भी कहते हैं। कई गुजराती दुकानदार इसी दिन दुकान दोबारा खोलकर नई बही से कारोबार शुरू करते हैं। यानी दिवाली पर बही पूजन, बेस्टु वरस पर नववर्ष की शुभकामनाएँ और लाभ पंचम पर कामकाज की शुरुआत, यह क्रम बहुत से व्यापारी निभाते हैं।
अंत में
चाहे आपका बड़ा कारोबार हो, छोटी दुकान हो या सिर्फ़ घर का हिसाब, शारदा पूजन साल की शुरुआत कृतज्ञता, ईमानदारी और शांत मन से करने का सरल तरीका है। दिवाली की तारीख और शाम का मुहूर्त दिवाली पेज पर देखें, अपने लिए सही समय चौघड़िया पेज से चुनें और अपने परिवार की परंपरा के अनुसार पूजन करें। दीपावली की शुभकामनाएँ।
दिवाली के सभी त्योहार: धनतेरस से लाभ पंचमी तक
- धनतेरस: सोना-चांदी खरीदारी, धन्वंतरि और लक्ष्मी-कुबेर पूजा
- काली चौदस / नरक चतुर्दशी: छोटी दिवाली, काली पूजा और अभ्यंग स्नान
- दिवाली: अमावस्या की रात लक्ष्मी पूजा
- शारदा पूजन (बही-खाता पूजन): दिवाली की रात नए बही-खाते की पूजा
- गोवर्धन पूजा (अन्नकूट): कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा
- गुजराती नववर्ष (बेसतु वर्ष): अन्नकूट वाले दिन
- भाई दूज: कार्तिक शुक्ल द्वितीया पर भाई को तिलक
- लाभ पंचमी: कार्तिक शुक्ल पंचमी पर दुकान का मुहूर्त









